मैं कौन तुम्हारा? कौन तुम्हारा मैं?
जैसे चंद्र को घेरे सितारे, कोई सितारा मैं..
या निद्रा में देखती हो हर रात जिसे, कोई स्वप्न न्यारा मैं..
कहो प्रिय, मैं कौन तुम्हारा? कौन तुम्हारा मैं?
रिक्त आच्छादित नभ में, इस माया कल्पित जग में,
कोई अतिथि क्षण भर का, या सर्वस्व तुम्हारा मैं...?
कहो प्रिय...
चञ्चल चपल मन में, इस नश्वर जीवन में,
कोई मोह चार दिन का, या प्राणों से बढ़कर प्यारा मैं...?
कहो प्रिय...
इस उर में धर कर भी, तुम पर सर्वस्व न्योछावर कर भी,
कोई सब जैसा एक इस जग में, या जग सारा मैं...?
कहो प्रिय मैं...
जड़ चेतन कितनों में, इन माटी के पुतलों में,
क्या मैं भी कोई तुम्हारा, या कोई नहीं तुम्हारा मैं...?
-राधा चौहान
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