अम्मा मुझको दिलवा दो इस फोन से मुक्ति
मैं भी फिर कर पाऊंगा, इस जग में कुछ उक्ति ।।
सपने बहुत देखता हूं मैं
गौरवशाली इतिहास रचूंगा
कर दूंगा मैं कुछ ऐसा
अपने पर ही घमंड करूंगा
सारी बातें रह जाती हैं
फोन में जब मैं घुस जाता हूं
गेम, रील मैं खो जाता हूं
मैं सुध बुध अपनी खो जाता हूं
फिर ना आये नजर मुझें कुछ
जादू इसका चल जाता है
इतिहास रचूंगा कल से मैं फिर
ख्वाब मेरा बस टल जाता है
इसके आगे बस कोई ना दिखता
जाने इसकी कैसी माया है
सारा दिन बस इसके संग ही
यही मेरा मित्र सखा है
कल से ना इसको छूओगा
मन में यह संकल्प लिया है
पर वो कल, कल ही रहता है
इसने मुझ पर जादू किया है
अम्मा मुझे दिला दो इससे मुक्ति
फिर ,मैं भी करूंगा जग में कुछ युक्ति
पर अम्मा तुम ,तुम मुझसे भी ज्यादा
इससे प्यार हो करती
मेरे साथ कुछ पल ही बिताती
पर इसको हाथों में इसको धर ती
फुर्सत नहीं जब किसी को इससे
कैसी जग में नाम करेंगे
अम्मा अब बस तुम ही बता दो
कैसे अब हम काम करेंगे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X