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सोने की चिड़ियाँ

                
                                                         
                            लूट मची है लूट लो जितना , मत बैठो बेकार
                                                                 
                            
देख के यह सोने की चिड़िया , सब है कहीं फरार

आपस में सब करते हैं देखो कितनी मारामारी
कौन बनेगा इनका शिकार, सब कातिल हैं शिकारी
सब के हाथ में है भाला, बरछी , तलवार
देख के यह सोने की चिड़ियाँ ,सब है कहीं फरार

कौन किसको लूट रहा है,कुछ होती नहीं खबर
सब तो घायल दिखते हैं, सब का उजड़ा है घर
सब व्यापारी हैं नफरत के, देश बन गया बाजार
देख के यह सोने की चिड़ियाँ ,सब है कहीं फरार

अब नहीं रही वो डाल , ना रही वो सोने की चिड़ियाँ
कितने बदल गए हैं लोग, कितनी बदल गई दुनिया
यहां वहां भागे फिरे, यहां से डर के बहार
देख के यह सोने की चिड़ियाँ ,सब है कहीं फरार

पहले कितना आजाद थे,घूमते थे सरेआम
अब तो है ना चैन कहीं, ना है कहीं आराम
जब रक्षक ही भक्षक बने तो, कौन बने पहरेदार
देख के यह सोने की चिड़ियाँ, सब है कहीं फरार
-रविन्द्र अमन 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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