ले चल ऐ हवाएं मुझको जी चाहे जहां
पर्वत हो, वन हो, जमीं हो या आसमां
बहारों के घुंघरूं मन में बजने लगे हैं
आंखों में हजार सपने सजने लगे हैं
उठता है मेरे दिल में पल पल खुशियों का तूफां
ले चल ऐ हवाएं मुझको जी चाहे जहां
दुनिया के चलन से मन ऊबने लगा है
उम्मीदों का सुरज यहां डूबने लगा है
एक नफरत के सिवा क्या रखा है यहां
ले चल ऐ हवाएं मुझको जी चाहे जहां
बदले ना ये मौसम ,ये बहारों की राहें
ना जाने क्या क्या देखने को तरसे मेरी निगाहें
हो अंत मेरे सफर का प्यार ही प्यार हो जहां
ले चल ऐ हवाएं मुझको जी चाहे जहां
-रविन्द्र अमन
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