आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी उम्र का जलना बाकी है

                
                                                         
                            अभी अभी तो सुबह हुई,
                                                                 
                            
अभी दिन का ढलना बाकी है
राही रुकने का नाम न ले, अभी दूर बहुत तेरी मंजिल
लंबा सफर का चलना बाकी है

दो चार कदम अभी चले हो तुम ,
तेरी आंखे भर आई है
जरा आगे बढ़कर देखो तो ,
कितनी ऊंची नीची खाई है
देखो बहके ना तेरे कदम, आगे है और कितने गम
देखो बहके ना तेरे कदम, अभी गिरकर संभलना बाकी है

दर्द, गम, बला से हर कोई हाथ छुड़ाता है
पर ना जाने क्यों इनसे मेरा बरसों का अच्छा नाता है
कभी सुबह जला , कभी शाम जला
इनके बाहों में मैं हूं पला
मैं जानता हूं इनके संग अभी ,
मेरी उम्र का जलना बाकी है

छोड़ दिया था हमने कब का सपना सजना
ये किसने क्या जादू किया , मै तो होने लगा दीवाना
शोर मचाए मुझको बुलाये, जाने किसकी आवाज
मै कुछ ना समझूं ,कुछ ना जानूँ ये कैसा है राज
जाने कहां से आएगा मेरे लिए खुशियों का संदेश
मेरे दिल को है इंतजार, अभी इसक मचलना बाकी है
-रविन्द्र अमन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर