आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हमने लिख दिया इतिहास

                
                                                         
                            परवाह नहीं कि भूख की,तड़पती रही मेरी प्यास
                                                                 
                            
धीरे धीरे हमने लिख दिया इतिहास

मेरे चारो ओर थे मजबूरी लाचारी के हालात
ना किसी का सहारा था, ना था किसी का साथ

एक दीन पिता का मै तो था औलाद
पर मेरे हौसले बुलंद थे, मेरा दिल था फ़ौलाद

मेरा बचपन फूल बनकर कभी ना खिला
समय के साथ जो मिलता है,
शायद मुझको नही मिला

हर गए थे मेरे नैन ,आसूं बहा बहाकर
पर हर हाल में मैने सीखा जीना मुस्कुराकर

मैं उस गली , उस कुचे से आया हूं निकलकर
जहां अच्छे अच्छे के हौसले हो जाते है राख जलकर

आज मुझको नई पहचान मिली है
मुझको मिला है मेरा नाम
ऊपर वाले की दुआ से मुझे मिल गया मुकाम

आज भी मेरा दिल रोता है, आंखों में आता है पानी
पर यह है मेरे धैर्य, मेरी हिम्मत, मेरी खुशी की निशानी

एक युग को समेटे हुए है, मेरे दुःख_ सुख के ये एहसास
धीरे-धीरे हमने लिख दिया इतिहास
-रविन्द्र अमन
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर