मिट जाती मेरी सदियों की प्यास
तू ने अगर मुझको अपना एक पल दिया होता
तुझसे दिल लगाना शायद मेरी भूल थी
पर किसी को चाहना कसूर नहीं होता है
जो प्यार का मंज़र बीत गया
यह सोच कर दिल रोता है
पर कब लौट कर आता है गुजरा हुआ जमाना
माना मुझसे मिलना तेरी कोई मजबूरी थी
पर अपना सब लूटा कर मैं पास तुम्हारे आया था
बातों को बढ़ाकर , किसी की दुनिया में आग लगाकर
कुछ लोग खुद से बन जाते हैं अनजान
कितना हसीन था वो प्यार का जमाना
मैं भंवरा बन कर रोज करता था तेरी बगिया में आना जाना
क्यों प्यार में होता है ऐसा अक्सर
अपना जादू चलाकर गुम हो जाते हैं दिलवर
अफसोस नहीं तेरे प्यार में हमको कुछ ना कुछ तो मिला है
बरसों बीत गए,तेरी यादों का फूल आज भी खिला है
आज भी तेरे हसीं सपनों में डूबकर
हम अपनी रातों को रंगीन किया कर लेते हैं
रविन्द्र अमन - कोलकाता
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