जब थी मैं कोख में माँ की
खुशहाली की लहर थी पूरे घर में
जन्म नहीं लिया था जबतक मैंने
जन्म लिया ज्यो ही मैंने
सिमत गए सबके Mathe
जैसे इनकी नाइया डूब गई हो
क्या. गुनाह किया मैंने
ईस जग मैं. आकर
बेटी हू अनर्थ नहीं
बेटी ना होती
बेटा और. वधू कहाँ से. Late
बेटी है जो आज किसी और
कल वो वधु और माँ है तुम्हारी
बेटा के हिमातियो
बेटी एक रत्न है अभिशाप नहीं
-रंजीत चाहर
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