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प्रेम विरह

                
                                                         
                            गजल
                                                                 
                            

आख़िरी बार मिला कुछ ऐसे ,
आँखों मे आँसू ले आया I

जैसे कोई ख़्वाब भुला दे ,
ऐसे तुमको भूल न पाया I

दु:ख मन मे रख हँसते रहना ,
तुमने फूलों जैसा दिल पाया I

जिसे बिछड़ना कहते हो तुम ,
उसने कितना दु:ख पहुंचाया I

तन्हा शाम ये सोच रही थी ,
सब इंसा हैं धूप का साया I

मन्दिर – मन्दिर मूरत देखीं ,
पत्थर दिल थे ,पत्थर काया I

इन शिखरों तक आते – आते ,
कितनी हारों को सहलाया I

तुझको छोड़ कहाँ जा पाते ,
कहने को मैं लौट तो आया I

 
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2 महीने पहले

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