जड़ता की पराकाष्ठा, पुरु बंधन से प्यार।
उन्मुक्त चेतन ने किया, देहबंध स्वीकार।।
मोर तोर की धूल पुरु, मन पर जमती जाय।
दर्पण धूमिल हो गया, माया है भरमाय।।
- पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
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