जब तक कर्ता भाव है, रहें पाप अरु पुण्य।
जन्म मरण होता रहे, अनासक्त नैपुण्य।।
होना युक्त अयुक्त पुरु, कारण सभी कषाय।
तत्व सदा अविभक्त है, उपाधि ही भरमाय।।
-पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
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