ज्ञाता भी अब ना रहा, बचा ज्ञान ही शेष।
वही सदा सर्वत्र है, चेतन नंद अशेष।।
मैं को मैं से विलग कर, देखें मैं है कौन।
करने वाला अगर तू, दृष्टा अंदर कौन।।
-पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
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