आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क़ में हारों का

                
                                                         
                            रंज़ और ग़म के मारों का,
                                                                 
                            
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
तड़पते रहते हैं उम्र भर,
कोई तिमारदार नहीं होता इन बेचरों का।

भटक रहे हैं शहर में
झलक तेरी एक पाने को,
नहीं तो और कौन रहता है इस शहर में
इन क़िस्मत के मारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।

कोई देखता नहीं इनकी ओर
फूटी हुई नज़रों से भी,
ये हैं जो बोलते रहते हैं उनको
फ़रिश्ता चाँद-तारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।

कोई रहता है इनसे फ़ना होकर
ख़ुशहाल अपने में,
ये हैं जो भूल गए हैं, होता है क्या
मौसम बहारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।

समझते हैं कि पिघला लेंगे
दिल ये पत्थरों का,
मगर कुछ हो नहीं पाता
रिश्तों में खड़ी हुई दीवारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
— पुनीत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर