रंज़ और ग़म के मारों का,
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
तड़पते रहते हैं उम्र भर,
कोई तिमारदार नहीं होता इन बेचरों का।
भटक रहे हैं शहर में
झलक तेरी एक पाने को,
नहीं तो और कौन रहता है इस शहर में
इन क़िस्मत के मारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
कोई देखता नहीं इनकी ओर
फूटी हुई नज़रों से भी,
ये हैं जो बोलते रहते हैं उनको
फ़रिश्ता चाँद-तारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
कोई रहता है इनसे फ़ना होकर
ख़ुशहाल अपने में,
ये हैं जो भूल गए हैं, होता है क्या
मौसम बहारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
समझते हैं कि पिघला लेंगे
दिल ये पत्थरों का,
मगर कुछ हो नहीं पाता
रिश्तों में खड़ी हुई दीवारों का।
कोई इलाज नहीं होता इश्क़ में हारों का।
— पुनीत
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