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मेरे अल्फाज़

मेरी बासंती रूह

Professor Ravindra Pratap Singh

74 कविताएं

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मेरी बासंती रूह
(अज़ाम अबीदोव की कविता
मूल कवि : अज़ाम अबीदोव
काव्यानुवादक : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह)

ताकतवर तो हूँ , निकल जायेंगे आँसू आँखों से
जंजीरों से बांध अपने हाथ
हमेशा पीता हूँ प्रेम
और निगलता हूँ प्रेम के शूल ख़ुशी ख़ुशी
और हाँ , फीनिक्स आती है
मेरी जिंदगी में , जिंदगी जो रौबदार है ग़मों में भी।
उड़ते हैं हम , और हाँ , अपने डैनों से
आता है आसमान नज़दीक , और नज़दीक !
अपने जिस्म की परवाह नहीं है मुझे
मेरी बासंती रूह बस्ती है -मेरे जज़्बे की
भले है यह मलिन बेनाम , लेकिन समेटे मुहब्बत,
और हाँ , ये ख़ुशी हामला है , ले खुशियां !
(मूल : ओह ! माय ब्लोसोमिंग सोल)


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