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मन तो चलता ही है रहता

                
                                                         
                            मन तो चलता ही है रहता
                                                                 
                            
(अज़ाम अबीदोव की उज़्बेकी कविता)
मूल कवि : अज़ाम अबीदोव
काव्यानुवादक : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह)

भले देख रखा है कितने
उजले, काले ,सब्ज़ दिनों को ।
वैसे कोई भी क्या खिंचता,
मन तो चलता ही है रहता ।

घास में उलझी मुर्दा चींटी
कोई हरकत क्या वो करती?
कितने कितने अनुभव लादे
चीज़ों की सदियाँ फैलाये।

(मूल: प्रायोरिटी)


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6 वर्ष पहले

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