एक कौआ
(अज़ाम अबीदोव की कविता
मूल कवि : अज़ाम अबीदोव
काव्यानुवादक : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह)
थोड़ा नीचे होकर उड़ता
तीन पथिक के ऊपर कौआ
गुजर रहे हैं तीनो कहते अपने वतन के किस्से।
कौआ 'बाज़ ' सोचता
खुद को ,
उड़ने लगा खूब ऊपर ।
तीनो पथिक देखिये
लगते अपनी मातृभूमि के कौए !
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