छठ उस माँ की प्रार्थना है,
जो अपने लिए कुछ नहीं माँगती,
बस अपने बच्चों की सलामती चाहे ।
छठ उस पिता की उम्मीद है,
जो चुपचाप घाट के किनारे खड़ा होकर
अपने परिवार के अच्छे कल की कामना करता है।
छठ उन लोगों का घर लौटना है,
जो साल भर दूर शहरों में रहते हैं,
और इस एक त्योहार के बहाने
फिर से अपने आँगन में लौट आते हैं।
छठ मिट्टी के उस चूल्हे की खुशबू है,
ठेकुए की मिठास है,
साफ-सुथरे आँगन की रौनक है,
और घर में गूँजते लोकगीतों की आवाज़ है।
छठ सिर्फ उगते सूरज को प्रणाम करना नहीं,
डूबते सूरज को भी सम्मान देना सिखाता है
कि जीवन में ढलती शामों का भी
अपना एक सम्मान होता है।
छठ में घाट तक जाती वह भीड़ नहीं,
उन लाखों दिलों की आस्था दिखती है
जो बिना किसी शिकायत के
अपनों के लिए व्रत रखते हैं।
छठ एक त्योहार नहीं…
एक एहसास है।
जहाँ भूख से बड़ी भक्ति होती है,
थकान से बड़ा विश्वास होता है,
और अपनी खुशी से पहले
अपने लोगों की खुशी होती है।
-प्रिया
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