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बस एक तुझसे जुड़ा था

                
                                                         
                            ना जाने कितनों से मिला था, पर
                                                                 
                            
बस एक तुझसे ही जुड़ा था ।
गैरों से शिकायते करता भी है कौन, पर
हमें तो तुझसे गिला था ।
तेरे नज़रों से दुर रह कर भी,
तेरे दिल के पास रहना था ।
ना जाने हमारे दरमियानं ,
कैसा ये सिलसिला था ।
कुछ बातें अनसुनी, अनकही रह गयी, पर
वो कितना हसीन पल था जब तु हमको मिला था ।
सबसे जुदा हो कर एक बस तेरा होने का,
ये मेरे दिल का फैसला था ।
पर ना जाने नजदिकियों में ये दुरियां कैसी,
ना जाने कैसा ये फासला था ।
तन्हाइयों में, बेचैनियों में मेरे दिल की ओर बढ़ रहा, बस
उदासियों का ये काफ़िला था ।
आज़ दो अजनबीयों को मिलते देखा, तो
याद आया कि मैं भी
ना जाने कितनों से मिला था,
बस एक तुझसे ही जुड़ा था ।।
-प्रीति गौतम 
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2 महीने पहले

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