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लाइब्रेरी ।

                
                                                         
                            लाइब्रेरी मैं जाना चाहतीं हुं, लेकिन
                                                                 
                            
मैं वहां अकेले बैठना चाहतीं हुं ।
वहां मैं उन चहारदिवारों से, और
खुद से खुद की बात करना चाहतीं हुं ।
जहां इतनी शांति हो हवा का झोंका भी नहीं,
मैं ऐसे लम्हों में जीना चाहतीं हुं ।
कुछ जख्मों के मरहम नहीं होते,
मैं अपने ऐसे दिल के जख्मों को सीना चाहतीं हुं ।
काश कोई समझ पाता,
जो मैं अपने मन की बातों को कहना चाहतीं हुं ।
अब राहें भी सुनसान नहीं लगतीं,
मैं उन हर -एक अनजान राहों से गुजरना चाहतीं हुं ।
जहां किताबों का ढेर हो,
मैं उन किताबों के बीच वहां रह के उन किताबों को,
पढ़ना, सुनना और समझना चाहतीं हुं ।
लाइब्रेरी मैं जाना चाहतीं हुं लेकिन
वहां मैं अकेले बैठना चाहतीं हुं ।।
-प्रीति गौतम 

 
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3 महीने पहले

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