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दूर हो सकता है

                
                                                         
                            एक दिन ये घर भी वीरान हो सकता है,
                                                                 
                            
अपना कहा हुआ भी अनजान हो सकता है।

जिस प्यार पे आज हमें इतना नाज़ है,
कल वही प्यार भी बेनाम हो सकता है।

जिसके साथ सजाए थे उम्रभर के ख़्वाब,
वो ख़्वाब भी आँखों में नाकाम हो सकता है।

आज जो परिवार हमारी दुनिया लगता है,
कल कोई अपना ही हमसे दूर हो सकता है।

न दौलत रहेगी, न रिश्ते हमेशा रहेंगे,
हर शख़्स यहाँ एक दिन मजबूर हो सकता है।

तो फिर किस बात की शिकायत करें हम,
जब वक़्त ही हर चीज़ का दस्तूर हो सकता है।

जो मिला है उसे दिल से गले लगाएँ,
जो छूट गया, उसका क्या कसूर हो सकता है।

हर जाने वाले को रोकना भी ठीक नहीं,
हर रिश्ता कहाँ उम्रभर का मंज़ूर हो सकता है।

जो छूट गया, उसको दुआ देकर भूल जाना,
हर दर्द भी एक दिन दिल से दूर हो सकता है।

न शिकवा रहे, न किसी से कोई गिला रहे,
जो मिला वही काफ़ी, जो छुटा मंजूर हो सकता है।

बस इतना समझकर सफ़र में बढ़ते रहो,
जो आज अपना है, कल वो भी दूर हो सकता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 hours ago

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