आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उसके घर का पता पूछा ही नहीं

                
                                                         
                            मैने उसके घर का पता पूछा ही नहीं
                                                                 
                            
‎सज़ा मालूम थी खता पूछा ही नहीं
‎वो दौर बीत गया कि हम किसी के होते थे
‎अब किसके हैं किसी ने पूछा ही नहीं
‎दुआ करो कि मेरी दुआ भी कभी रंग लाए
‎मेरी क्या दुआ थी खुदा ने पूछा ही नहीं
‎कभी उनके दर तक तो पहुंच ही जाना है
‎मिलने पर पहचानोगे हमने तुमसे पूछा ही नहीं
‎तुम साथ साथ चलो न कुछ कदम मेरे साथ भी
‎कहानी का अंजाम क्या है तुमने पूछा ही नहीं
‎कुछ किस्से ख़त्म हो जाते हैं राह तकते तकते
‎मेरी कहानी में कौन से किरदार हो पूछा ही नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
48 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर