वो हाल पूछ के आगे बढ़ गई, उसे ख़बर ही नहीं,
एक सवाल ने कितना मुझे छुआ, उसे ख़बर ही नहीं।
मैं चाहता था वो देर तक ठहरकर पूछे मेरा मिजाज़
उसने पूछकर भी कुछ नहीं पूछा—उसे ख़बर ही नहीं।
मेरे ज़ख़्म से ज़्यादा तो दिल को चोट लगी,
ज़ख्म का हाल पूछा दिल का नहीं—उसे ख़बर ही नहीं।
वो फ़र्ज़ समझ के निभाती रही हमदर्द होनेका
मैं उसे इश्क़ समझ बैठा—उसे ख़बर ही नहीं।
उसकी मुस्कान को मैंने ग़ज़ल बना डाला,
वो मेरी रातों की सुकून की वजह है—उसे ख़बर ही नहीं।
मैं उसके एक-एक लफ़्ज़ का मतलब ढूँढ़ता हूँ,
वो बस यूं ही बात करती है—उसे ख़बर ही नहीं।
मैंने चाहा है उसे, इस क़दर कि क्या कहिए,
मगर इस चाहत की बात दोस्तों, उसे ख़बर ही नहीं।
न उसने वादा किया, न कभी क़रीब आई,
मैं फिर भी उसका रहा—क्यों रहा, उसे ख़बर ही नहीं
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