लाल साड़ी में जो तुम आज नज़र आईं हो,
जैसे बरसों की दुआ बनके असर छाई हो।
तुमको देखा तो लगा, चाँद में सच में ही कमी है
तुम ज़मीं पर क्या परी नगर से आई हो?
तुमने बालों को जो सँवारा, तो लगा यूँ मुझको,
शाम की गोद में चुपचाप कर सवेर आईं हो।
मुस्कुराकर जो देखा जानिब इक पल तुमने
क्या मेरी ख़ामोश मोहब्बत की ख़बर लाई हो।
वो जो माथे पे तुम्हारे है चमकता हुआ नूर,
जैसे रातों में ज़मीं पर अप्सरा उतर आई हो।।
तुम्हारे होंठों की मुस्कान पर क्या कहूं तुमसे
गालों के गड्ढे दिखा, जान लेने पर उतर आई हो।
तुम गुज़रती रहीं और मैं तुम्हें देखता रहा,
मेरी आँखों में तुम कोई प्यास बन उतर आई हो
बात करनी थी मगर बात कहाँ हो पाई,
छोड़ो न, तुम तो हर एक मुलाकात भूल आई हो।
तुम्हें मालूम नहीं तुमको निहारते हुए,
लगता है किसी बंजारे की मंजिल बन आई हो।
तुमको चाहूँ भी तो इज़हार करूँ किस तरह,
मेरी राहों में आई हो पर थोड़ी देर से आई हो।
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