"उसकी फैमिली कभी मेरी नहीं बन पाई"
मैंने सोचा था एक दिन सब अपने हो जाएंगे,
मेरी मोहब्बत को समझेंगे, मुझे भी अपना बनाएंगे।
पर शायद कुछ रिश्ते सिर्फ़ सपनों में ही पूरे होते हैं,
हक़ीक़त में कुछ लोग कभी अपने नहीं होते हैं।
मैंने दिल से उसकी फैमिली को अपनाना चाहा,
हर रिश्ते को इज़्ज़त और प्यार से निभाया।
पर मेरी कोशिशों के बदले मुझे इल्ज़ाम मिले,
और मेरी ख़ामोशी में भी बस सवाल मिले।
उन्होंने मेरी गलतियाँ तो देखीं,
पर मेरी मोहब्बत कभी नहीं देखी।
मेरे आँसुओं का दर्द समझने की कोशिश नहीं की,
बस एक फ़ैसला किया और मेरी बात अधूरी छोड़ दी।
सबसे ज़्यादा दर्द तो इस बात का है,
कि जिसके लिए मैंने सबसे रिश्ता जोड़ा,
वही इंसान मेरा हाथ पकड़कर कह न सका—
"ये मेरी अपनी है, इसे गलत मत समझो।"
आज समझ आया,
हर किसी को अपना बनाया नहीं जा सकता।
कुछ लोग ज़िंदगी में मोहब्बत बनकर आते हैं,
पर अपना घर कभी नहीं बना पाते।
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