"प्रेम का सबसे कठिन प्रश्न"
मुझे प्रेम कभी पसंद नहीं था...
न किसी का इंतज़ार,
न किसी के वादों पर विश्वास।
फिर तुम आए...
और मेरी शांत दुनिया में
मोहब्बत का पहला अक्षर लिख गए।
तुमने ही सिखाया था
कि किसी पर दिल कैसे रखा जाता है,
फिर उसी दिल को
बिना आवाज़ किए तोड़कर चले गए।
आज भी समझ नहीं आता,
अगर छोड़कर ही जाना था,
तो मेरी ज़िंदगी में आए क्यों?
अगर साथ निभाना नहीं था,
तो जीवन भर के सपने दिखाए क्यों?
सब कहते रहे—
"माफ़ी माँग लो..."
पर किसी ने यह नहीं पूछा
कि गलती आख़िर थी किसकी?
दोष मेरा नहीं था,
फिर भी सिर मेरा ही झुकाया गया।
मेरी बेगुनाही से ज़्यादा
लोगों को मेरी ख़ामोशी पसंद आई।
मैं हर दिन
तुम्हारे एक फ़ोन का इंतज़ार करती रही।
हर बार घंटी बजती,
तो दिल धड़क उठता—
"शायद इस बार तुम हो..."
लेकिन हर बार
उम्मीद ही मेरे हाथ लगी,
और तुम...
मेरी तड़प से बिल्कुल बेख़बर रहे।
क्या एक बार भी
तुम्हारे दिल ने तुम्हें नहीं टोका?
क्या एक बार भी
तुम्हारे होंठों पर "माफ़ करना" नहीं आया?
क्या मेरी आँखों के आँसू
इतने सस्ते थे,
कि उन्हें पोंछने के लिए
तुम्हारे पास दो शब्द भी नहीं थे?
मैं बात करने के लिए तड़पती रही,
और तुम्हें
मेरी मौजूदगी से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
अब बताओ...
मैं उस रिश्ते को आगे क्यों बढ़ाऊँ,
जिसमें प्रेम सिर्फ़ मेरा था,
इंतज़ार सिर्फ़ मेरा था,
और दर्द भी सिर्फ़ मेरा ही था?
प्रेम वहाँ नहीं होता
जहाँ एक व्यक्ति रोता रहे
और दूसरा चैन से सो जाए।
आज मैं तुम्हें नहीं पुकारती,
क्योंकि अब समझ गई हूँ—
जिस रिश्ते में
सम्मान खो जाए,
वहाँ प्रेम भी धीरे-धीरे मर जाता है।
तुम्हारे जाने का दुःख
शायद एक दिन कम हो जाएगा,
पर यह प्रश्न
जीवन भर मेरे साथ रहेगा—
जिसे मैंने अपना सब कुछ माना,
क्या उसने मुझे
एक बार भी अपना माना था?
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