होकर मासूम मिजाज़ ए वक्त भी समझ ना पाया मैने जान कर अपना तुम्हें धोखा भी कितना खाया हमने
करूं गिला कैसे अब मैं हर किसी से हो गया तू ही बेगाना जब से अंदाज़ ए बेरुखी भू जान ना पाया हमने
बढ़ा के फासला हुआ तू मगरुर बहुत फिर भी तो लाकर करार दिल में दिया आस का जला ना पाया हमने
करूं क्या सच ये तेरी गुस्ताखियों से डरने मैं लगा हूं करके याद गुज़रा ज़माना आस कभी ना जगाया हमने
दिखा कर बार बार आईना मुझे मत छेड़ो तराना ए उल्फत और लाकर तुम्हें ख्वाब में दर्द ना बढ़ाया हमने
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