हर इरादा हर फैसला आपका मुताबिक मेरे ना रहा कभी सच तो ये भी राह ए वफा जुनून आपका कुछ और था
ये ना पता था समेट कर अरमां सारे घुट घुट कर जीना पड़ेगा हमें आज़ तो गरजते बादलों का शोर कुछ और था
सिर्फ तेरे इशारों पर बनाया रस्ता मैंने पहाड़ काट के और देखा जब उठा के नजर तो मिजाज़ तेरा ही कुछ और था
किया क्यूं मैने इंतजार तेरा बेसब्री से ये ना पता चला हमें आज कल मुताबिक आपके ही चल रहा सुनहरा दौर था
पूछ के रस्ता तेरी दलहीज़ का घबराए भी हम बहुत करके अब गिला तुमसे ही जाना मैंने मसला तेरा कुछ और था
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X