जाने कैसी मजबूरियों में जी रहा हूं बढ़ा के फासला तुमसे अब होकर बेचैन जिंदगी से दिल को मैं सता रहा हूं
गुजारा होता नहीं मगर गुजारा करना पड़ा है हमें सता के बेचैन दिल बार बार फिर भी रस्म ए मैं निभा रहा हूं
होगा ना हमसे अरमां दिल का बुझाना मिल कर तुमसे जुदा ना हुए दिल से कभी अरमां दिल में सजा रहा हूं
करके दोस्ती कांटों से मिला कब चैन ओ सकूं दिल को अंजाम ए वफा जो होगा देख लेंगे दर्द मैं बढ़ा रहा हूं
मिले ना तुम तो करके दोस्ती कांटों से दर्द बढ़ाना पड़ा सता कर बेचैन दिल को चिराग़ ए दिल मैं जला रहा हूं
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