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फसाना ए रस्म ए उल्फत

                
                                                         
                            मिटा कर फिक्र किसी को दिल कभी दिया नहीं करते होकर मगरुर राह ए तलब भी दीवार उठाया नही करते
                                                                 
                            
मैं खुद ही बिकने को आ गया तेरी दुनिया में मिटा कर किसी की हसरतें किसी को गुनहगार समझा नहीं करते
मैं ढल जाता हूं बदलते हालात में चुप भी मैं हो जाता हूं देख इस तरह किसी को अदाकार समझा नहीं करते
राह ए जिंदगी सौदा जो किया तूने गलत है नेक लोगों में हमें गिना जाता है देकर दर्द गद्दार समझा नहीं करते
हम आपके जब हैं नहीं तो क्यूं ऐतबार मुझ पर इंकार करने से मिला भी क्या तुम्हें तो हम समझा नहीं सकते

 
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9 घंटे पहले

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