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फसाना ए नाकाम जिंदगी

                
                                                         
                            मैं तो अपनी मर्जी का मालिक और गुलाम किसी का नहीं बढ़ा कर फासला मुझसे गर तुम खुश बहुत तो ये मर्जी तेरी
                                                                 
                            
तमन्ना ओ हसरत पे ऐतबार बार बार हम भी करते नहीं बुझा के चिराग़ ए दिल मेरा फिर भी दर्द नहीं तो ये मर्जी तेरी
अब तो होकर बर्बाद सुधरना भी हमें आ गया करके जुल्म ओ सितम मुझ पे बार बार गर चुप रहोगे तो ये मर्जी तेरी
अंजाम वादा ए उल्फत तुम क्या जानो बाद मुद्दत तुम ही मिले हों आज़ बदल कर फैसला गर खुश हो तो मर्जी तेरी
खाकर ठोकरें राह ए वफा बार बार फिर भी घबराए हम नहीं कभी देख कर मायूसी मेरी गर खुश हो तो मर्जी तेरी
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10 घंटे पहले

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