ना जाने किस मुकाम पर अब मैं आ पहुंचा जो सोच कर नसीब अपना होकर मायूस जिंदगी को बार बार कोसने लगा हूं
ऐ जिंदगी तुमने भी कभी हमें अपना समझा कहां लाकर तुम्हें ख्याल ओ ख्वाब में अब मैं दिल को नसीहतें देने लगा हूं
है ये दुआ मेरी ना करो अब और जुल्म ओ सितम मेरे गम का कोई इलाज नहीं सोच कर अपनी आदतें बदलने लगा हूं
करो फैसला कोई मुताबिक निभाया जो रस्म ए वफा शिद्दत से परख के मिजाज़ आपका ही शिकायतें करने मैं लगा हूं
बढ़ा कर नादानियां धोखा बार बार मैं खाने लगा हूं कुछ तो अब लिहाज़ करो तोड़ के दिल अपना आदतें बदलने लगा हूं
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