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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            मिजाज़ ए वक्त जाना कब किसी ने सिर्फ झोका हवा का आया मेरे घर के आंगन में उड़ा के ख्वाब तन्हा हमें छोड़ गया
                                                                 
                            
कहूं फसाना ए दिल भी किस किस से बसे थे जो दिल में कभी करके मायूस मिटा कर अरमां सारे तन्हा हमें छोड़ गया
कयामत ये कहूं सच में कैसे गिरा के दीवार आंगन की मेरी चुरा के शराफत सारी करके मायूस बार बार दिल तोड़ गया
हालांकि तेरे चाहने वालों में इक मैं था तुम जानते थे आकर तुम अचानक सामने मेरे मेहमानों की तरह हुनर छोड़ गया
कर ना पाया हासिल कभी चाहा जिसे मैंने और इक शख्स बढ़ा के अदावत हमसे मिटा कर अरमां सारे दिल तोड़ गया
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एक महीने पहले

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