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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            चल के कदम पे कदम साथ तेरे जो कहना था कह ना पाया मैं सिमट कर यादों के भंवर में चैन ओ सकूं खोना पड़ा
                                                                 
                            
ऐ जिंदगी हुआ तू नाराज़ कैसे हमें सोचना पड़ा करके महसूस दर्द अपना ही होकर बेचैन तमाम रात दर्द ढोना पड़ा
बदल गई दुनिया कितनी रस्म ए वफा कोई निभाता कहां करके याद ज़माना आपका ही हमें फैसला कोई लेना पड़ा
परख कर मुफलिसी अपनी ही अच्छा किया मैने चल कर कांटों के राह पर उम्र सारी अब तो बगैर तेरे ही जीना पड़ा
देकर हिसाब तुम्हें अपनी बरबादियों का जानता हूं मिलेगा कुछ नहीं करके सख्त फैसला तमाम उम्र दर्द ढोना पड़ा
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3 hours ago

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