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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            तेरी मर्जी के मुताबिक अब तो दर्द सहना भी सीखना पड़ रहा हमें अब ना रहे किसी काम के ये भी सोचना पड़ा हमें
                                                                 
                            
करके गुस्ताखियां मिला चैन ओ सकूं कब किसी को ही आकर तमन्नाओं के भंवर में खिलाफ तेरे भी सोचना पड़ा हमें
हुआ तू रुखसत जब से बढ़ा कर फासला खातिर या लिहाज़ से बढ़ा कर मायूसी दिल में मिजाज़ तेरा सहना पड़ा हमें
मिला कर हमें खाक में अंदाज बदल दिया तुने ही दिल पर जो बीती है बढ़ा कर हौसला सच क्या है कहना पड़ा हमें
सच तो ये भी तेरे दीद की तमन्ना लिए रात भर हम रोए और हुआ जो दर्द मासूमों की तरह तुमसे कहना पड़ा हमें
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18 घंटे पहले

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