आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए कश्मकश जिंदगी

                
                                                         
                            ना जाने क्यूं आज़ हमें पलट कर पास तेरे वापस आना पड़ा ये सोच कर सूरत तेरी मेरे दिल बेमिसाल नजर आया है
                                                                 
                            
इक गुजारिश है आपसे लगा कर मुंह गैरों को मगरुर मत किया करो देख कर तुम्हें हमें गुज़रा ज़माना याद आया है
हर घड़ी दर्द बढ़ाना किसी का अच्छी बात नहीं होकर मैं मजबूर आपकी आदतों से दिल मशवरा देना याद आया है
मिला के खुद को खाक में नक्श ए दिल पर जो गुजरी देख कर अचानक सामने हमें गुज़रा जमाना याद आया है
ऐ मेरे हम दम मंजूर हमें हर तेरी इनायतें इक जरा सी बात पर मुंह मोड़ना हमें गुज़रा जमाना तेरा याद आया है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर