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फसाना ए दौर ए मुसीबत

                
                                                         
                            दौर ए मुसीबत में कोई अपना नहीं मिलता सुना कर दर्द अपना किसी गैर को बार बार चैन ओ सकूं कभी नहीं मिलता
                                                                 
                            
गर खुश है देख कर बर्बाद हमें तो खुश हमेशा मिटा के अरमां दर्द देने वाला सिवा तेरे हमें भी कोई और नहीं मिलता
इक तमाशा जो देखा आज मैने कुछ और देख लेने दो वक्त का भरोसा क्या दिल तुमसे भी तो मेरा कभी नहीं मिलता
मना के जश्न नाकामियों का मुश्किलें अपनी बढ़ा रहा हूं बढ़ा के फासला फिर भी तो चैन ओ सकूं कभी नहीं मिलता
समझ गया मैं मिजाज़ तेरा चैन से सोने दो उलझ के तमन्नाओं के मंजर में दिल भी कभी किसी और से नहीं मिलता
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3 महीने पहले

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