दर्द ए बेचैन दिल हम बढ़ाए हैं सीख कर जीना अंधेरों में करके गिला तुमसे आज हम चिराग ए दिल बुझाए हैं
जी कर अंधेरों में मिला कब सकूं किसी को जान कर फलसफा जिंदगी का होकर मायूस सामने तेरे हम आए हैं
करके भरोसा वफाओं पे मिला कब किसी को बढ़ा कर मायूसी दिल में आज फिर से दर्द कुछ और हम बढ़ाए हैं
समझ कर इरादा तेरा हैरान हमें होना पड़ा है शायद हम ना रहे काबिल तेरे सोच के ख्वाहिशें सारी हम मिटाए हैं
सोचा था दूंगा मैं जवाब तुम्हें किसी रोज़ मगर धर दिया तुने ही इल्जाम मुझ पर सोच के दर्द आज हम घबराए हैं
और क्या सोच कर आने जाने वालों में चेहरा तेरा ढूंढता रहा मैं जान के फलसफा जिंदगी का फर्ज हम निभाए हैं
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