मिला कब सौगात ए वफा हर किसी को खाकर ठोकरें बार बार खुद को अब खाक में मिलाना चाहता हूं
समेट कर बिखरती तमन्नाएं मिला कब खुशी हमें होकर मायूस वफाओं से भी दर्द और बढ़ाना चाहता हूं
जिक्र वफाओं का कर ना मैं किसी और से बुझा कर चिराग ए दिल मेरा क्या पाया तूने जानना चाहता हूं
करके ऐतबार हर किसी पर धोखा खाया मैने बार बार सुना के फसाना ए दर्द गम तुमसे बाटना चाहता हूं
हां मैं वही जिसे आप ही कभी दिल दे बैठे थे करके याद गुज़रा ज़माना अपना सच तुम्हें बताना चाहता हूं
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