समेट कर बिखरती यादों को बढ़ा कर बेकरारी इक अर्ज तुमसे करना पड़ा ना रहे हम किसी काम के सोचना पड़ा
बुझा कर चिराग़ ए दिल बढ़ाओ मत तुम बेचैनियां मेरी चल के कांटों की राह पे हमें अब अंदाज़ तेरा सोचना पड़ा
सच तो ये भी दर्द मेरा तुमने कभी अपनी दर्द जाना कहां बढ़ा कर मायूसी दिल में हमें सच सारा अब कहना पड़ा
मेरी बर्बादियों पर हसने वाले क्या खोया क्या पाया सोचा नहीं कभी जान कर ईरादा आपका ये सच सोचना पड़ा
मिले कब मुझसे तुम खुशदिली से सोचा ये कहां तुमने जीने में रखा क्या है अंदाज ए बेरुखी आपका सोचना पड़ा
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