अकेले रहने की सजा हमने क्यूं कुबूल की है तुझ पे ही ऐतबार ना करने की ये कौन सी भूल की है
ख्याल आया कि रस्ता बदल लेंगे हम कभी करीब तेरे जाने की जिद में हमने ज़िन्दगी फिजूल की है
ना जाने कौन सा लम्हा करार का होगा तेरे लिए अपना तुम्हें समझने में हमने इक भूल जरूर की है
हमें ख्याल था तू वापस लौट आएगा कभी दिल किस किताब में ना जाने क्यूं तस्वीर तेरी कुबूल की है
दर खुला रख कर इंतजार किया तेरा कांपते लफ्ज़ कह रहे हैं तुम्हें समझने में मैंने अक्सर भूल की है
ये किन नज़रों से तूने मुझे कैद किया समझने में भूल हुई दिल तड़प के कह रहा बेशक इक भूल हुई है
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