आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए बेचैन जिंदगी

                
                                                         
                            अकेले रहने की सजा हमने क्यूं कुबूल की है तुझ पे ही ऐतबार ना करने की ये कौन सी भूल की है
                                                                 
                            
ख्याल आया कि रस्ता बदल लेंगे हम कभी करीब तेरे जाने की जिद में हमने ज़िन्दगी फिजूल की है
ना जाने कौन सा लम्हा करार का होगा तेरे लिए अपना तुम्हें समझने में हमने इक भूल जरूर की है
हमें ख्याल था तू वापस लौट आएगा कभी दिल किस किताब में ना जाने क्यूं तस्वीर तेरी कुबूल की है
दर खुला रख कर इंतजार किया तेरा कांपते लफ्ज़ कह रहे हैं तुम्हें समझने में मैंने अक्सर भूल की है
ये किन नज़रों से तूने मुझे कैद किया समझने में भूल हुई दिल तड़प के कह रहा बेशक इक भूल हुई है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर