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फसाना ए बेचैन जिंदगी

                
                                                         
                            देख कर तेरे चेहरे में उदासी सच क्या है तुमसे पूछना पड़ा चांद से चेहरे में अब वो नूर कहां हमें सच समझना पड़ा
                                                                 
                            
छुपा कर महरूमियत अपनी ही बताया तुमने हमें कुछ नही गम ए उल्फत में किया क्या तूने मसला समझना पड़ा
तेरी खुशमिजाजी के चर्चे थे चार सु फिर भी क्यूं तुम्हें अंदाज ए नजर में पैमाना ए चाहत अपना अब छुपाना पड़ा
करके मुझे तन्हा छोड़ने वाले तुम्हें तन्हा होना पड़ा जो कर रहे थे नाज़ खुद पर क्यूं तुम्हें बेगाना अब होना पड़ा
परख कर गर्दिश ए हालात मेरी किया है कब याद तूने आखिर कुछ तो मजबूरी होगी जरूर जो चुप होना पड़ा
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3 घंटे पहले

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