करके इक सवाल मुझसे तुम क्या सोच रहे बढ़ा कर
हौसला दिल का फिर अरमां सारे मिटा रहे हो
मैं इतना खुशनसीब नहीं जो बढ़ा कर हौसला करीब
तेरे आ सकूं समझ कर नादां दर्द बढ़ा रहे हो
मेरी खुशी को तुमने अपना कभी जाना कहां बुझा के
चिराग़ दिल मेरा तुम ही कुछ दर्द बढ़ा रहे हो
जाओ चिराग़ ठिकाना कहीं और ढूंढ लो उलझा कर
हमें फरेबी उजालों में दर्द तुम और बढ़ा रहे हो
खाकर ठोकरें बार बार आए आज हम सामने
तेरे और समझा कर जीने का मसला हमको सता रहे हो
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