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फसाना ए बर्बाद दिल

                
                                                         
                            मुस्करा कर मैं जीना चाहता हूं समझ कर तुम्हें अपना बढ़ा कर अरमां बेशुमार फलसफा जिंदगी का समझना चाहता हूं
                                                                 
                            
या खुदा तुम ना समझ सके दर्द बेगुनाह का करके मुश्किलों से सामना होकर मायूस तुमसे अब मैं सच कहना चाहता हूं
सच ये कर ना सके तुम ऐतबार मेरी वफाओं पर करूं क्या मना के जश्न ए बर्बादी मिला जो दर्द बेशुमार कहना चाहता हूं
बढ़ा के दर्द ओ तमन्ना करू क्या खुशियां भुलाना पड़ा मिले ना तुम तो बढ़ा के दर्द अब दोस्ती कांटों से करना चाहता हूं
भीड़ में समझ कर यूं ही रहबर तुम्हें बताना चाहा किस्सा ए गम अपना और तुम हो ना सके मेरे कभी ये कहना चाहता हूं
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4 घंटे पहले

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