आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंदाज ए बेरुखी

                
                                                         
                            गुजारना वक्त हुआ मुश्किल जिंदा मगर सकूं ना हम पा सके कभी घुट घुट कर जीना पड़ा हमें
                                                                 
                            
हाल ये कि जीने का कोई शौक नहीं फिर भी जीना पड़ा हमें करूं क्या मजबूर होना पड़ा हमें
मिजाज़ वक्त का जान कर मायूस हुआ जिंदगी के सफर में भी दुश्मन से हाथ मिलाना पड़ा हमें
महफिल में उस जगह आ बैठा जहां मुश्किल है नज़र मिलाना तुमसे सोच के पछताना पड़ा हमें
सारे चेहरों से अलग तेरा चेहरा परखना पड़ा तुझको हमें अब नाकामियों से दिल लगाना पड़ा हमें
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर