वक्त ए रुखसत क्या सोच के नज़र झुका कर गया तमाम ख्वाहिशें वो मेरी मिटा कर गया
यूं लगा जैसे लौट कर दोबारा वापस आ जायेगा एहसास कुछ ऐसा ही मुझे करा कर गया
हम तमन्नाओं के बहकावे में मगरुर हुए लगा कि वक्त ए रुखसत अरमां वो जगा कर गया
शायद दोबारा मिल जाए रस्म ओ राह में दिल की बेचैनियाँ मेरी कुछ इस तरह बढ़ा कर गया
सितम ये हम न हो सके उसके कभी जगा कर एहसास दिल में वो नक्श ए पा मिटा कर गया
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