आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अफसाना ए दर्द ए दिल

                
                                                         
                            परख कर महरूमी अपनी हुआ जो दर्द सोचना पड़ा बढ़ा कर दर्द ओ तमन्ना करूं मैं गिला किस किस से सोचना पड़ा है
                                                                 
                            
करके सामना गर्दिश ए हालात से चिराग़ ए दिल बुझा रहा हूं ये जिंदगी इक हादसा है मेरे लिए ये सच तुमसे कहना पड़ा है
परख के गुस्ताखियां अपनी क्या खोया क्या पाया ये सोचा करो लाकर तुम्हें ख्वाब में भी अब दर्द ओ तमन्ना कहना पड़ा है
हुआ तू रुखसत जब से दर्द और बढ़ाना पड़ा हमें इल्म रोने का सीखा नहीं फिर भी थाम कर दिल अपना अब रोना पड़ा है
होकर मायूस अपनी ही किस्मत से मिटा कर हसरतें सारी किया जो जुल्म ओ सितम मुझ पे खुदा कसम दर्द बढ़ाना पड़ा है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर