आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो पीपल का पेड़

                
                                                         
                            वो पीपल का पेड़
                                                                 
                            

कहाँ गया वो पीपल का पेड़, जो दूर से ही दिख जाता था,
उसी पेड़ के होने से कभी, हमको पहचाना जाता था।

वही पीपल का पेड़ था जिसकी छाँव में बच्चे खेला करते थे,
बैठे रहते थे डालों पे जब बकरियाँ चराया करते थे।
लगता था चौपाल यही पे,
पंच यहीं विराजा करते थे,
होते थे यहीं सभी फैसले,
पंच-दंड भी सुनाया करते थे।
रात में भूतों का भी बसेरा,
इसी पेड़ पर बताया जाता था,
कहाँ गया वो पीपल का पेड़
जो दूर से ही दिख जाता था।

पूजा, धागा, चंदन-कुंकु, आरती,
सब इसकी उतारा करते थे,
कोई मन्नत, कोई दान-दक्षिणा देकर,
इसको पवित्र बनाया करते थे।
नाऊ, हलवाई और हाट भी,
यहीं कहीं तो लगता था,
बीच दुपहरी इसी छाँव में,
सबका मन यहां रमता था।
चाय पे चर्चा, मज़े की बातें,
सबकी यहीं पे होती थीं,
यहीं बैठे-बैठे कइयों संग,
गप्पें सारी जग की होती थीं।
यहीं खुलता था पोल सभी का,
यहीं गहन चिंतन भी होता था,
किसी के सुख-दुःख की बातें थीं,
किसी का मन भी हल्का होता था।

कभी चबूतरा, कभी मंदिर,
कभी चौराहे का बस-स्टैंड बन जाता था,
और कभी-कभी दूर खड़ा,
यही भुतहा पीपल कहलाता था।
गाँव के सारे मेलों और झगड़ों का,
यही वो दर्शक पुराना था,
कितनी पीढ़ियाँ, अनेकों मौसम,
सब देख चुका वो पीपल का पेड़ पुराना था।
आज न जाने कहाँ गया ,
वो पीपल का पेड़,जो दूर से ही दिख जाता था,
उसी पेड़ के होने से कभी हमको पहचाना जाता था।
उसी पेड़ के होने से कभी हमको पहचाना जाता था।

- प्रेम
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर