रात... गुज़रते लम्हों संग ऐसा क्या हुआ,
न ख़्वाबों का पता, न ख़यालों का पुलिंदा ही खुल रहा...
बस इक उसकी याद, साँसों संग आती-जाती है,
ये रात ही तो है जो मुझको उससे मिलाती है,
हर रोज़ शाम संग वो आती है,
रात... अँधियारा, सितारों संग मेरा चाँद भी लाती है।
आँखियों के कोने में छुपा वो कतरा-कतरा,
पलकों के हिलने से बह जाएगा,
क्यों बरसता है ये बरसात-सा,
ऐ रात, तुझको समझ नहीं आएगा,
न ग़म, न शिकवा, न शिकायत कोई,
रोग प्यार का ये मुझको यूँ ही सताती है
ये रात ही तो है, जो मुझको उससे मिलाती है,
हर रोज़ शाम संग वो आती है,
रात... अँधियारा, सितारों संग मेरा चाँद लाती है।
पूछा जो रात ने मुझसे— मैं तो तब भी आती थी, अब भी आती हूँ, अँधियारा, सितारे और चाँद, संग तब भी लाती थी, अब भी लाती हूँ। मुस्कुरा पड़ा दिल, रात की बात सुन,
कहा—कहने को तो सब थे मगर, तब तू तन्हा, अकेली आती थी, अब मेरा चाँद संग लाती है,
दूर कितनी भी है आज मुझसे लेकिन,
एहसास उसका आज भी मुझमें कहीं बाकी है,
ऐ रात, अब संग तेरे हर रात मेरा चाँद मुझसे मिलने आती है,
ये रात ही तो है जो मुझको उससे मिलाती है,
हर रोज़ शाम संग वो आती है...
रात... अँधियारा, सितारों संग मेरा चाँद लाती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X