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कभी कुछ दीवारों से भी तो पूछ कर देखो

                
                                                         
                            कभी कुछ दीवारों से भी तो पूछ कर देखो,
                                                                 
                            
इन्होंने कितने लम्हों को
खुद से टकराते देखा है—
कभी खिलखिलाते,
तो कभी टूटकर बिखरते देखा है।
चेहरों को हँसते देखा है,
आँखों को रोते देखा है,
किसी को ग़म छुपाने के लिए
खुद से लिपटते देखा है,
तो किसी को खुशी के आँसू छुपाने के लिए
चुपचाप मुँह फेरते देखा है।
कभी कोई टिककर
इनके संग बैठा,
हाथों में हाथ लिए…
तो कभी इन्हीं से टकराकर
कइयों को लहूलुहान होते देखा है।
कभी किसी तस्वीर को
अपने भीतर सहेजा है,
यादों की झलक दिखाते हुए…
तो कभी उसी तस्वीर पर
जमी धूल के साथ
यादों को मिटते देखा है।
हर कोई इनके पीछे
खुद को महसूस करता था—
जैसा वह सच में था,
बिना किसी मुखौटे के।
मगर इनके बाहर निकलते ही
हर चेहरा बदल जाता था—
कभी अपना,
कभी बेगाना,
तो कभी खुद से ही जुदा।
ये दीवारें जानती हैं—
कौन यहाँ अपना था,
कौन बस ठहरा था,
किसने रिश्ते सँवारे,
और किसने उन्हें
खामोशी में बिखरते देखा था।
ये सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं,
इनकी दरारों में आज भी
अनकही बातें,
अधूरे रिश्ते
और कुछ दबे हुए आँसू हैं।
आज भी ये उसी जगह खड़ी हैं,
मगर जिनके लिए कभी
ये घर हुआ करती थीं,
वो लोग अब
अपने ही घरों में
अजनबी हो गए हैं।
कितनी आहटें आईं,
कितनी लौट गईं—
कुछ कदम फिर कभी नहीं आए,
कुछ आवाज़ें
हमेशा के लिए ख़ामोश हो गईं।
और ये दीवारें…
सब कुछ सुनकर भी
चुप रहीं।
शायद इसलिए कि
इंसान बदल जाते हैं,
रिश्ते बदल जाते हैं,
यादें भी धुँधली पड़ जाती हैं—
मगर ये दीवारें
मौन गवाह रह जाती हैं।
कभी फुर्सत मिले,
तो इनसे भी पूछ कर देखो…
शायद ये सब बता दें,
जो लोग कह नहीं पाए।
किसी घर की कहानी
उसमें रहने वालों से नहीं,
कभी उसकी दीवारों से पूछ कर तो देखो—
ये झूठ नहीं बोलतीं।
कभी कुछ दीवारों से भी
तो पूछ कर देखो…
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एक महीने पहले

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