गुटर गूँ में छिपा पहला-पहला इश्क़
मेरी खामोशियों में भी
तेरी धड़कनों का ज़िक्र है,
वो अनकही-सी चाहत,
वो मीठी-सी कसक है,
कहूँ क्या इसे भला,
मन मस्त मलंग है—
गुटर गूँ में छिपा ये
पहला-पहला इश्क़ है।
वो पहली नज़र मिली तो
मौसम बदल गया,
याद तेरी आई और
ये दिल मचल गया।
जाने कैसा मीठा-मीठा दर्द है,
गुटर गूँ में छिपा ये
पहला-पहला इश्क़ है।
बेचैन, तन्हा जब भी
मन ये होता है,
कैसे कहूँ तुझको—
बस तू संग होता है।
मुलाकातों का न जाने
कैसा ये रंग है,
गुटर गूँ में छिपा ये
पहला-पहला इश्क़ है।
तेरी आहट-सी लगती है
जब हवाएँ गुजरती हैं,
तेरी यादों की खुशबू से
रातें सँवरती हैं।
अब तो खामोशियों में भी
तुझसे बातें होती हैं,
गुटर गूँ में छिपा ये
पहला-पहला इश्क़ है।
न कोई वादा,
न कोई इकरार हुआ,
फिर भी न जाने कब
मुझपे हक़ तुम्हारा हुआ।
कुछ रिश्ता है साँसों का,
कुछ धड़कनों से नाता है—
गुटर गूँ में छिपा ये
पहला-पहला इश्क़ है।
-प्रेम
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